पापा-मम्मी की 50 वीं सालगिरह पर उनकी जीवनी संस्मरण
सभी मेहमानों का मैं तहे दिल से स्वागत करती हूँ। अब हम ज्यादा देर ना करते हुए अपने कार्यक्रम की शुरुआत भगवान गणेश की स्तुति से करते हैं जिसे आपके सामने प्रस्तुत कर रही हैं
मेरे मम्मी-पापा की शादी की 50वीं सालगिरह के अवसर पर आए सभी अतिथियों का मैं पूरे उपाध्याय परिवार की तरफ से तहे दिल से धन्यवाद करना चाहती हूँ, जिन्होनें अपना कीमती समय निकाला और हमारी खुशियों में शामिल होकर हमारी खुशियाँ कई गुना बढ़ा दी।
ये हमारी एक छोटी सी कोशिश है मम्मी-पापा के जीवन के कुछ महत्त्वपूर्ण लम्हों को आपके सामने प्रस्तुत करने की, बस आप सभी के साथ और होसलाफजाई की आवश्यकता है।
आशा करती हूँ आपको हमारी ये छोटी सी प्रस्तुति पसंद आएगी।
तो फिर चलिए शुरू करते हैं: –
मेरे पापा का जन्म नागौर जिले के एक छोटे से रियाँ में हुआ था और मेरी मम्मी का डिडवाना के पास चौलूखाँ मे। मेरे दादाजी गाँव से दूर शहर में काम करते थे और मेरी दादीजी बहुत ही भोली थी इसलिए पापा और कमला बुआ दोनों की परवरिश घर से दूर हुई। जहाँ कमला बुआ अपनी ननिहाल में रही तो वहीं पापा ने अपनी पढ़ाई घर से दूर अपने काकाजी के साथ रहकर की और उनके साथ काम भी सीखा।
दूसरी तरफ मम्मी छः भाई और भाभियों के बीच में सबसे लाड़ली थी, क्योंकि दोनों बड़ी मौसियों की शादी हो चुकी थी। लाड़ली होने के कारण घर के काम-काज से मम्मी का दूर-दूर तक नाता ही नहीं था। इसलिए जब मम्मी 14 या 15 साल की हुई तो मेरी मौसी जी ने उन्हें अपने पास बुला लिया ताकि शादी से पहले घर के कुछ काम-काज सीख सके।
मेरी मौसी की शादी मेरे दादाजी के छोटे भाई के साथ ही हुई थी इसलिए मम्मी शादी से पहले ही अपने होने वाले ससुराल आ गई। अब मम्मी ने घर का काम-काज तो सीखा या नहीं ये तो मलूल नहीं लेकिन मम्मी का रियाँ में भी खेलना जारी था।
भा यानि मेरे दादाजी ने मुझे एक बार बताया था कि किसी कार्यक्रम में वे और मेरे नानाजी कुछ लोगों के साथ बैठे हुए थे तभी मेरी मम्मी भागते हुए आई और आकर मेरे दादाजी की गोद में बैठ गई। तब मेरे दादाजी ने कहा कि इसे तो मैं मेरी बहु बनाऊँगा। दादाजी ने वैसे तो यह बात यूँ ही कही थी लेकिन कहते हैं ना कि दिन में एक बार जबान पर सरस्वती जी विराजमान होती है तो बाद में यह बात सच भी हो गई।
वैसे पापा तो गाँव से बाहर ही रहते थे लेकिन फिर भी गाँव तो आते ही होंगे, तो शायद दोनों साथ में खेलते भी होंगे और फिर शायद कुछ ऐसा हुआ हो
आ मेरे हमजोली आ, खेलें आँख मिचौली आ ……….
नैन लड़ जई हैं तो मनवा मा कसक ……….
जहाँ भी जाती हूँ वहीं चले आते हो चोरी-चोरी मेरे ……….
मेरे होते कोई और ………… चाहे चले छुरियाँ
शूकर करो कि पड़े नहीं है मेरी माँ के डंडे ………… ये पहले बताते बारात लेकर आते
मिल गए, मिल गए आज मेरे संयम आज मेरे जमीं पर नहीं ……….
हम तुझको उठा कर ले जाएंगे डोली में बैठा ……….
बड़े अरमानों से रखा है सनम तेरी कसम प्यार की दुनियाँ में ……….
शादी के बाद मम्मी-पापा इंदौर आ गए और मम्मी पापा की ड़फली पर कदम से कदम मिला कर उनके साथ चलने लगी।
डफली वाले डफली बजा ……….
मैं तो भूल चली बाबुल का देश पिया का घर प्यारा लगे ……….
फिर इंदौर में ही एक-एक कर के हम चारों का जन्म हुआ। इंदौर में पापा का व्यापार खूब अच्छा चल रहा था। घर में रुपये पैसों की कोई कमी नहीं थी, उस जमाने में जब किसी के पास साइकिल होना भी बड़ी बात मानी जाती थी पापा के पास अपना स्कूटर और घर में फोन था। जिंदगी की गाड़ी बड़े मजे से चल रही थी।
मनु भाई मोटर चली पाम पाम पाम ……….
उठे सब के कदम देखो तर-रम-पम ……….
बाबू समझो इशारे हॉर्न पुकारे ……….
लेकिन खुशियों के साथ-साथ दुख भी चलता हैं, पापा को व्यापार में नुकसान हो गया और हमें इंदौर छोड़ कर जयपुर आना पड़ा।
यहाँ आने पर पता चला कि जिस मकान का पापा पिछले छः महीने से किराया भर रहे थे वहाँ तो कोई और ही किरायेदार रह रहा है। अब ट्रक में भरा हुआ समान और 4 छोटे-छोटे बच्चे (विक्की तब केवल एक साल का था) कहाँ जाते। तब एक रिश्तेदार ने हमारी मदद की और एक दूसरा मकान किराये पर दिलवाया।
उनकों भी एडवांस किराया देना पड़ा, अब पापा के पास में बहुत ही कम पैसे बचे थे। यहाँ आने के एक दो सालों तक पापा का काम अच्छी तरह से नहीं जमा था। सारी जमा पूंजी खत्म सी हो गई थी। हम चारों बच्चे नादान थे, हम इंदौर में पूरा ग्लास भर कर दूध पीते थे, तो हमें यहाँ भी दूध का पूरा भरा हुआ ग्लास ही चाहिए था। लेकिन यहाँ तो 6 जनों के बीच में आधा लीटर दूध! अब मम्मी चार ग्लास कैसे भरती? तो वो ग्लास में थोड़ा सा दूध डालकर बाकी का ग्लास पानी से भर देती।
लेकिन ऐसी घड़ी में भी मम्मी ने पापा से शिकायत नहीं की। घर में मेहमानों की आवभगत मानमनुहार में मम्मी ने कभी कोई कमी नहीं की तंगहाली के दिनों में भी सबका खुले दिल से स्वागत किया। रात को बारह बजे भी कोई मेहमान जाता तो उसे भूखा नहीं सोने देती यहाँ तक कि उनके कपड़े तक मम्मी ने अपने हाथों से धोकर दिए।
और पापा ने भी मम्मी का पूरा साथ निभाया, पापा हमेशा सुबह का खाना बनाने तथा अन्य काम करने में मम्मी की मदद करते थे। इस कारण काम पर देर से जा पाते थे। Market में व्यापारी लोग बोलते, उपाध्याय जी घर के काम-धाम छोड़कर व्यापार पर ज्यादा ध्यान दो, लेकिन पापा जानते थे आठ से दस लोगों का काम अकेले करना कोई आसान नहीं होता और नौकर रखने की हैसियत नहीं थी। इसलिए लोगों का कहा हँसी में टाल देते।
इंदौर में पापा के पास स्कूटर था और जयपुर में केवल एक पुरानी साइकिल। उसी से पापा रोज आठ से दस-किलोमीटर दूर मार्केट जाते और वहाँ दिन भर उसी से एक दुकान से दूसरी दुकान पर जाते। जल्द ही पापा की मेहनत और ईमानदारी रंग लाई और कुछ ही सालों में पापा ने न केवल व्यापार में बल्कि दिलों में भी अपनी जगह बना ली।
पापा जिनके भी साथ रहे या जिनके साथ भी काम किया उन सभी के साथ पापा का दिल से दिल तक का नाता बना। मुझे कुछ धुंधला-धुंधला सा याद है कि जब हम इंदौर छोड़ कर जयपुर आ रहे थे तो मोहल्ले के लोग जमा हो गए और पापा से कहने लगे कि उपाध्याय जी आप मत जाइए हम आपका पूरा साथ देंगे, यहाँ तक कि मकान मालिक ने भी कहाँ कि उपाध्याय जी जब तक आपका धंधा वापस नहीं जमता तब तक आप किराया मत देना। लेकिन हमारा दाना-पानी जयपुर का ही लिखा था।
ऐसा नहीं है कि जयपुर आने के बाद सब कुछ सही हो गया। जयपुर में भी तीन-चार बार ऐसा हुआ कि हम अर्श से फर्श पर आए / व्यापार में उतार चढ़ाव आया, लेकिन माँ चामुंडा की कृपा, बुजुर्गों के आशीर्वाद, परिजनों के साथ और तथा अपनी मेहनत और ईमानदारी से पापा ने हर बार फर्श से अर्श तक का सफर तय किया और आज हमारी कुलदेवी की कृपा से हमारे घर में किसी चीज की कमी नहीं हैं।
किस्मत की हवा कभी नरम कभी गरम ……….
हँसते-हँसते कट जाएं रस्ते जिंदगी यू ही ……….
यूँ ही कट जाएगा सफर साथ चलने से के मंजिल आएगी नजर साथ चलने से ……….
पापा हर साल एक डेढ़ महीने के लिए टूर पर जाते थे और वहाँ से हमेशा मेरी मम्मी के लिए दो साड़ियाँ लाते थे और मेरी मम्मी उन दो साड़ियों को इतना संभाल कर रखती की अगले दो तीन सालों तक लगभग हर Function या Party में मम्मी इन्हीं साड़ियों में दिखाई देती, मम्मी ने पापा से कभी कोई डिमांड नहीं की, लेकिन हम तो बच्चे थे तो हमारी डिमांड तो जायज ही थी। और पापा भी हर बार टूर से आते वक्त हमारे किये बहुत सारी कहानियों की किताबे लाते थे।
बता दूँ क्या लाना तुम लौट के आ जाना ……….
सात समुन्द्र पार से गुड़ियों के बाजार से ……….
मेरे पापा और मम्मी दोनों ही मेहनती तो हैं ही लेकिन एक चीज दोनों में अलग हैं जहाँ पापा दिल से एकदम कोमल वहीं मम्मी एकदम मजबूत। शायद कोमलता और जीवटता का यही संगम इन दोनों की ताकत था कि जीवन में इतनी बार उतार चढ़ाव आए लेकीन दोनों ने कभी हार नहीं मानी और हर बार पहले से और भी ज्यादा सक्षम होकर आगे आए।
मम्मी तो कठिनाइयों में पापा की हमसफ़र थी ही लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने मुसीबत के समय में पापा का हाथ कभी नहीं छोड़ा, हमेशा पापा की हिम्मत बन कर उनके साथ खड़े रहे, उनमें से एक हैं हमारे कुमार अंकल उन्होंने एक बड़े भाई की तरह हर कदम पर पापा का साथ दिया। आज भी वे किसी से पापा का परिचय एक एजेंट की तरह नहीं बल्कि अपना छोटा भाई कह कर करवाते है। पापा पर जब भी मुसीबत आई उनका यही कहना होता था, “उपाध्याय जी घबराओं मत, मैं आपके साथ हूँ, सब ठीक हो जाएगा।“
और दूसरे हैं विनोद अंकल इन्होंने भी पापा को एक एजेंट नहीं अपना बड़ा भाई मान कर पूरा मान दिया और मुसीबत के समय एक साये की तरह पापा के साथ रहे।
और एक हैं हमारे पड़ोसी गुप्ता अंकल, उन्हीं के कारण जयपुर में हमारा खुद का मकान बन पाया। मेरे पापा तो शुरू से खाने और खिलाने में ही रहे कभी अपना जोड़ने पर उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया। ये तो गुप्ता अंकल ही थे जिन्होंने पापा की पीछे पड़ कर प्लॉट दिलाया और पूरे मकान का काम अपनी देखरेख में करवाया। आज हम जो हैं इसमें उनका बहुत योगदान हैं, नहीं तो शायद मेरे पापा तो अपना मकान कभी बना ही नहीं पाते। मेरी मम्मी तो आज भी गुप्ता अंकल को दिल से दुआएं देती हैं।
कोई जब राह ना पाए मेरे संग आए तेरी दोस्ती मेरा प्यार
ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे तोड़ेंगे दम मगर
तेरे जैसा यार कहाँ कहाँ ऐसा याराना
यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी
मेरे पापा और मम्मी दोनों ही रिश्ते को सहेज कर रखने में विश्वास रखते है उनका मानना है कि रिश्ते पानी की तरह होते है यदि कोई उनमें कितनी भी लाठी मारे वो आपस में एक हो ही जाते हैं।
हमारे घर में मेहमानों का आना लगा ही रहता हैं, इस बात पर एक बात याद आ गई कि जब भी हमारी गली में कोई टैक्सी आती तो हमारे पड़ोसी बोलते कि राखी देखना ये टैक्सी तुम्हारे यहाँ ही रुकने वाली है। पापा मम्मी की इस परंपरा को मेरे दोनों भाई और दोनों भाभियाँ भी पूरे मन से निभा रहे हैं।
मेरे पापा इतने दयालु है कि वे किसी और का दुख दर्द देख ही नहीं सकते। यदि कोई अपनी समस्या लेकर पापा के पास मदद मांगने के लिए आ जाता तो खुद के पास पैसे ना होने पर वे किसी और से पैसे लेकर उसकी मदद कर देते थे।
अपने माता-पिता की सेवा के बारे में बात करूँ तो मेरे पापा ने अपने माता-पिता की इतनी सेवा की है कि लोग उन्हें उपाध्याय परिवार का श्रवण कुमार कह कर पुकारते हैं। भा यानि मेरे दादाजी को कैंसर था लेकिन फिर भी वे काफी हद तक उनका काम खुद कर लेते थे। उनके अंतिम कुछ दिनों में ही उनकी सेवा करनी पड़ी, लेकिन बाईं मेरी दादी की मेरी पापा ने लगभग पाँच सालों तक तन-मन से सेवा की, उन्हें नहलाना-धुलाना, खाना खिलाना, हर काम उन्होंने ही किया। हाँ, मम्मी और परिवार के बाकी सदस्यों का भी पूरा साथ था।
मैं यह तो नहीं कह सकती कि मम्मी-पापा में कभी तकरार नहीं हुई होगी लेकिन हमने अपने बचपन में मम्मी-पापाको कभी आपस में झगड़ते नहीं देखा। हाँ आजकल तो दोनों थोड़ा-थोड़ा झगड़ लेते हैं। दोनों ने एक दूसरे का इतना साथ निभाया कि जब घर में सब कुछ था तब तो घर में खुशियाँ होती ही थी लेकिन तंगहाली में भी कभी घर से खुशियाँ नहीं गई।
आज भी पापा, मम्मी की इतनी चिंता करते है कि मम्मी को थोड़ा सा भी कुछ हो जाता है तो उनका कहीं मन ही नहीं लगता और यही हाल मम्मी का भी है। फर्क बस इतना सा है कि पापा का दिल बहुत ही कोमल है और उनकी चिंता दिख जाती है। लेकिन मेरी मम्मी अंदर से बहुत strong है, इसलिए उनकी चिंता हमें दिखाई नहीं देती।
मम्मी मेरी अच्छी है खराब नहीं लेकिन मेरे पापा का जवाब ……….
है ना बोलो-बोलो मम्मी बोलो-बोलो ……….
अब मैं अपने पापा मम्मी को स्टेज पर बुलाना चाहूँगी, मम्मी-पापा
क्या यही प्यार है, हाँ यही प्यार है, दिल तेरे बिन कहीं लगता नहीं वक्त गुजरता नहीं ……….
स्टेज पर आने के बाद
ओ मेरी जोहरे जबी तू अभी तक है हंसी ……….
last
ये तो सच है कि भगवान है