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आखिरी वादा

आखिरी वादा 2

राजस्थान का नागौर शहर, आज दिनांक 13 अगस्त 2022 को नलिनी रॉय को एक खबर मिली और उनकी आँखों के सामने आज से पच्चीस साल पहले की घटनाएं एक-एक करके सामने आने लगी।

29 जुलाई, 1997, टी.वी. पर हर न्यूज चेनल पर एक ही खबर थी कि 10 जुलाई 1999 की रात में लद्दाख़ बॉर्डर पर हुई भयंकर बर्फबारी और बर्फीले तूफान में भारतीय सेना के 15 जवान लापता हो गए है और जवानों की खोज जारी है।

नलिनी रॉय ने भी जब से यह खबर सुनी वह तो आप सुध-बुध भूल कर टी.वी. के सामने ही बैठी है। उसे तो अपने तीन साल के बेटे अर्पित और 15 दिन की दुधमुँही बेटी हर्षिता की भी सुध नहीं थी। रिश्तेदार ही उनकी देख-रेख कर रहे थे।

जैसे ही किसी जवान के मिलने की खबर आती तो उसके चेहरे पर एक उम्मीद की किरण दिखाई दे जाती और जब किसी जवान की लाश मिलती तो चेहरे पर चिंता की लकीरें फैल जाती।

केवल नलिनी रॉय का ही नहीं घर के अन्य सदस्यों, नलिनी के सास-ससुर का भी यही हाल था। और हो भी क्यों नहीं 32 साल के लेफ्टिनेंट रुद्रप्रताप रॉय, नलिनी रॉय के पति और अपने माता-पिता कौशल्या और सूबेदार भवानीशंकर की इकलौती संतान, भी इन्हीं पंद्रह जवानों में से एक था।

सभी अपनी साँसों को रोककर बस एक ही खबर की आस लगाए बैठे थे कि बस कहीं से लेफ्टिनेंट रुद्रप्रताप रॉय की सलामती की खबर मिल जाये।

अभी सात महीने पहले की ही तो बात है जब रुद्रप्रताप अपनी पत्नी से विदा लेते हुए बोल कर गए थे कि इस बार मैं जब घर आऊँ तब मुझे तुम्हारी गोद में एक प्यारी सी गुड़िया मिलनी चाहिए।

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बेटी के जन्म पर भी उनका फोन आया था। उन्होंनें यह कह कर कि इसके आने से घर में खुशियाँ आ गई है इसलिए इसका नाम हर्षिता ही रखेंगे। उन्होनें कहा था कि बस अब में जल्दी से अपनी नन्हीं सी परी से मिलना चाहता हूँ। बस आज ही छुट्टियों की अर्जी लगा दूंगा।

पाँच दिन बाद ही उन्होनें बताया था कि उनकी छुट्टियों की अर्जी स्वीकृत हो गई है और 15 अगस्त को वे अपनी हर्षिता से मिलने घर आ रहे है। उनकी आवाज से ही उनकी खुशी की झलक दिखाई दे रही थी। लेकिन चार दिन पहले ही बॉर्डर पर लड़ाई छिड़ गई और आज यह समाचार, विश्वास ही नहीं हो रहा था।

दिन निकलते जा रहे थे और इसके साथ ही इन सबकी बैचेनी भी बढ़ती जा रही थी। सात जवानों के शव बरामद हो चुके थे और 4 जवान बहुत ही गंभीर अवस्था में मिले थे और उनका इलाज चल रहा था।

दस दिन बीत चुके थे, बर्फबारी लगातार जारी थी। इन चारों जवानों का अब भी कुछ पता नहीं चला था। हो सकता था कि ये हिमस्खलन के समय जवान गहरी बर्फ के नीचे दब गए हो और वैसे भी लगातार हो रही बर्फबारी के कारण बर्फ की परत मोटी होती जा रही थी। ऐसे में उनके जीवन की आस करना बिल्कुल बेमानी जान पड़ता था।

और यह भी हो सकता था कि तूफान के कारण जवान भटक कर बॉर्डर के उस तरफ चले गए हों और दुश्मन सेना ने उन्हें बंदी बना लिया हो। इस आस से उनके जीवन की कुछ उम्मीद बनती थी।

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डूबते को क्या चाहिए बस एक तिनके का सहारा! नलिनी रॉय, और लेफ्टिनेंट रुद्रप्रताप रॉय के माता-पिता के लिए यही बात जैसे उनकी उम्मीदों को जिंदा किए हुए थी।

किसी भी जवान के माँ-बाप या पत्नी कभी भी यह नहीं चाहते कि उनका बेटा या पति दुश्मनों की गिरफ्त में आए लेकिन आज ये सभी ईश्वर से यहीं प्रार्थना कर रहे थे कि चाहे रुद्रप्रताप दुश्मनों की गिरफ्त में हो लेकिन सुरक्षित हो।

चार महीने गुजर चुके थे एक-एक करके तीन और जवानों के शव मिल चुके थे लेकिन लेफ्टिनेंट रुद्रप्रताप रॉय अब भी लापता थे। उनके दुश्मन सेना की गिरफ्त में होने के कयास भी धूमिल हो चुके थे। सेना ने तो उनके जिंदा होने की आस छोड़ दी थी। लेकिन नलिनी की आँखे तो द्वार पर उनके आने की आस में टकटकी लगाए हुए थी।

सात साल बाद भी लेफ्टिनेंट रुद्रप्रताप रॉय का शव नहीं मिला तो भारतीय सेना ने सन् 2004 को (भारतीय कानून के अनुसार) उन्हें मृत मान कर शहीद घोषित कर दिया। लेकिन नलिनी यह मानने के लिए तैयार ही नहीं थी। उसने पति के आने की आस नहीं छोड़ी और अपने पति को शहीद मानने से इनकार कर दिया।

सूबेदार भवानीशंकर ने तो इस बात को स्वीकार कर लिया था लेकिन माँ तो आखिर माँ ही होती है कौशल्या ने भी नलिनी की तरह अपने बेटे के आने की आस लगा रखी थी।

नलिनी बड़ी जिम्मेदारी से अपने बच्चों का पालन पोषण कर रही थी। वह उन्हें उनके पिता लेफ्टिनेंट रुद्रप्रताप की वीरता के किस्से सुनाया करती और कहती कि तुम्हारे पिता ने मुझसे वादा किया था कि वो 15 अगस्त को जरूर आएंगे वो अपना वादा जरूर निभाएंगे।

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तभी नलिनी एकदम से वर्तमान में आई उनका बेटा अर्पित उन्हें आवाज लगा रहा था। माँ-माँ पिताजी मिल गए है। सेना से संदेश आया है कि कल सुबह तक उन्हें यहाँ ले आएंगे। काश दादा-दादी भी पिताजी की एक झलक देख पाते, लेकिन वे तो पहले ही उनके …… और उसकी आँखों में आँसू आ गए।

अगले दिन सुबह से ही नलिनी की आँखे दरवाजे से बाहर सड़क पर दूर तक देख रही थी अपने पति की एक झलक पाने को बेताब थी, तभी खबर आई कि मौसम खराब होने के कारण उनका विमान उड़ान नहीं भर सका है इसलिए एक दिन की देर और हो जाएगी।

खैर नलिनी का इंतजार पूरा हुआ और लेफ्टिनेंट रुद्रप्रताप की देह तिरंगे में लिपटी हुई ससम्मान उसके द्वार पर थी। नलिनी ही नहीं आज पूरा गाँव अपने सपूत के अंतिम दर्शनों के लिए बेताब था। उसने भरी हुई आँखों से उन्हें सेल्यूट किया और उनसे लिपट गई।

लेफ्टिनेंट रुद्रप्रताप के ओजस्वी चेहरे पर एक अनोखी शांति थी क्योंकि उन्होनें अपना वादा पूरा कर दिया था क्योंकि आज 15 अगस्त था।

उनके साथ आए जवानों ने बताया कि लेफ्टिनेंट रुद्रप्रताप रॉय की तलाश तो जारी थी लेकिन बर्फ की मोटी परत के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा था। अभी कुछ दिनों पहले ही कुछ और जवान बर्फीले तूफान का शिकार हो गए थे उनकी खोज के दौरान एक बंकर मिला जिसमें लेफ्टिनेंट रुद्रप्रताप रॉय का शव मिला।

इतने कम तापमान और बर्फ के कारण उनका शरीर बिल्कुल सही सलामत था। डॉक्टरों का कहना था कि जहाँ पर लेफ्टिनेंट रुद्रप्रताप रॉय का शव मिला वह की ऊंचाई लगभग 20 हजार फुट से ज्यादा थी और वहाँ का तापमान भी माइनस पचास से कम ही रहता है।

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इतने कम तापमान में किसी भी तरह का जीवन लगभग असंभव है इसलिए शरीर को सड़ाने और गलाने वाले बैक्टीरिया और वायरस भी यहां एक्टिव नहीं हो पाते। इसलिए लेफ्टिनेंट रुद्रप्रताप रॉय के शरीर को कुछ भी नुकसान नहीं हुआ यह बिल्कुल सही सलामत रहा। इनको देख कर ऐसा ही लगता है जैसे कि इनकी मृत्यु आज ही हुई हो।

शहीद लेफ्टिनेंट रुद्रप्रताप रॉय की अन्त्येष्टि पूरे राजकीय सम्मान के साथ की गई। उन्हें 21 बंदूकों की सलामी दी गई जिसमें उनका बेटा अर्पित भी शामिल था, “लेफ्टिनेंट अर्पित”।

उसके पति वैसे तो आज से पच्चीस साल पहले ही ये दुनियाँ छोड़ के जा चुके थे, लेकिन वे उसके विश्वास, उसकी साँसों व उसकी आस में जिंदा थे। कल तक वह एक सुहागिन थी, लेकिन आज वह एक शहीद की विधवा थी, एक वीरांगना थी। उसके पति उसे छोड़ कर जा चुके थे।

सही माइनों में उसके पति की उससे विदाई तो आज ही हुई थी।

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