फिल्म रिव्यू “मर्दानी-3” 2026: क्या रानी मुखर्जी फिर जीत पाईं दिल? जानें पूरा विश्लेषण“
✍️ परिचय
साल 2014 में ‘मर्दानी’ बनकर दिल्ली के गर्ल चाइल्ड ट्रैफिकिंग गैंग का सफाया, तथा साल 2019 की फिल्म ‘मर्दानी 2’ में राजस्थान के खूंखार रेपिस्ट का खात्मा करने वाली धाकड़ पुलिसवाली शिवानी शिवाजी रॉय यानी रानी मुखर्जी, साल 2026 की ‘मर्दानी 3’ में फिर से अपने उसी पुराने ‘नो नॉनसेंस, ओनली एक्शन’ वाले अवतार में लौट कर आई हैं।
फिल्म की कहानी युष गुप्ता, दीपक किंगरानी और बलजीत सिंह मारवाह ने लिखी है। इसकी खासियत यह है कि छोटी बच्चियों की तस्करी के जुर्म की जानी-पहचानी और कई बार देखी सुनी गई कहानी होने के बावजूद यह फिल्म और रानी मुखर्जी, दोनों ही अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब हुई है।
मर्दानी फ्रेंचाइजी की यह तीसरी फिल्म है जो एक बार फिर समाज के ऐसे अंधेरे कोने में झांकती है, जहाँ की सच्चाई डरावनी, घिनौनी और मन को झकझोर देने वाली है, जिसमें छोटी बच्चियों की किडनैपिंग, मानव तस्करी के अलावा मेडिकल रिसर्च के नाम पर होने वाले अमानवीय शोषण को बेबाकी से दिखाया गया है। किरदारों का दमदार अभिनय, शानदार सिनेमैटोग्राफी और प्रभावशाली क्लाइमेक्स फिल्म को देखने लायक बनाते हैं।
कमजोर संवाद और थोड़ी खिंची हुई पटकथा होने के बावजूद भी यह फिल्म दर्शकों को इस बारे में सोचने और असहज होने पर मजबूर कर देती है। ‘अम्मा’ के रूप में विलेन की धमाकेदार एंट्री और रानी का दमदार कॉप अवतार इसे एक मस्ट-वॉच फिल्म बना रहा है।
🎭 कहानी (Story Review)
कहानी की शुरुआत बुलंदशहर के एक वीवीआईपी की बेटी रूहानी और उसकी केयरटेकर की की मासूम बच्ची झिलमिल के अपहरण से शुरू होती है। इन बच्चियों को बचाने का जिम्मा मिलता है, SSP शिवानी शिवाजी रॉय (रानी मुखर्जी) को।
जब शिवानी इस केस की पड़ताल में जुटती है, तो पता चलता है कि पिछले तीन महीनों में करीब 93 बच्चियां अलग-अलग जगहों से गायब हुई हैं। अब यह मामला सिर्फ अपहरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जांच के दौरान धीरे धीरे छोटी बच्चियों की तस्करी और संगठित अपराध का एक बहुत ही भयानक नेटवर्क सामने आने लगता है, जिसके तार बच्चियों की खरीद-फरोख्त करने वाली भिखारी गैंग की सरगना अम्मा (मल्लिका प्रसाद) से जुड़ते हैं।
निर्मम अम्मा, जो मासूम बच्चियाँ तो क्या दुहमुंहे बच्चों तक, किसी को भी बड़ी बेदर्दी से मौत की नींद सुलाने में वक्त नहीं लगाती।

अम्मा, जो मासूम बच्चियों को एक बेहद संवेदनशील और अमानवीय धंधे का हिस्सा बनाती है। शिवानी जैसे-जैसे इस केस की तह में घुसती जाती है, इसकी जड़ें कहीं ज्यादा गंभीर अपराध के दलदल में और भी गगहराई में धँसती जाती हैं जो दर्शकों की बचैनी बढ़ाती जाती है।
इसी केस के दौरान ही शिवानी की मुलाकात रामानुजन (प्रजेश कश्यप) से होती है, एक सामाजिक कार्यकर्ता है और भिखारी माफिया के खिलाफ काम करता है। बचपन में वह भी इस माफिया का शिकार होता है।
इसके बाद शिवानी एक के बाद एक अम्मा के ठिकानों पर छापेमारी का सिलसिला शुरू करती है, लेकिन इंटरवल से ठीक पहले अम्मा शिवानी को खुली चुनौती के बाद यह कहानी शतरंज के खेल की तरह शह और मात के खेल में बदल जाती है।
इंटरवल के बाद कहानी कई परतें खोलती है। रामानुजन के किरदार से जुड़ा एक बड़ा व बहुत झी भयावह रहस्य सामने आता है, जो यह संकेत देता है कि इस अपराध के पीछे सिर्फ तस्करी नहीं, बल्कि कुछ ऐसा भी है, जिसका इस्तेमाल ताकतवर लोग अपने फायदे के लिए करते हैं।
🌟 अभिनय और किरदार (Performance Review)
बात करें एक्टिंग की, तो फिल्म का पूरा दारोमदार रानी मुखर्जी अपने कंधों पर बखूबी से उठाती हैं। SSP शिवानी शिवाजी रॉय के रोल में रानी मुखर्जी एक बार फिर यह साबित करती हैं कि मर्दानी फ्रेंचाइजी की असली ताकत वही हैं। उनकी नियंत्रित बॉडी लैंग्वेज, चेहरे के सूक्ष्म भाव, आंखों की सख्ती और संवादों की डिलीवरी शिवानी शिवाजी रॉय के किरदार को पूरी तरह असली और भरोसेमंद बना देती है। उनका अभिनय शिवानी के भीतर चल रहे इमोशन्स, संघर्ष, ग़ुस्से और संवेदनशीलता को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता है। फिल्म के कई दृश्य ऐसे हैं जहां रानी मुखर्जी संवादों से ज़्यादा अपनी ख़ामोशी के ज़रिये असर छोड़ती हैं।
अम्मा के रोल में मल्लिका प्रसाद ने जबरदस्त खौफ पैदा किया है। कई सीन में उनका किरदार दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देता है। फिल्म के हर फ्रेम में वह रानी मुखर्जी को कड़ी टक्कर देती नजर आती हैं।
रामानुजन के किरदार में प्रजेश कश्यप फिल्म का सबसे बड़ा सरप्राइज साबित होते हैं, जो अपने अभिनय से सबको चौंका देते हैं। नई-नवेली कॉस्टेबल फातिमा के किरदार में जानकी बोदीवाला का अभिनय भी बिल्कुल संतुलित और प्रभावशाली है, वहीं जिशु सेन गुप्ता को बहुत ही काम सीमित स्क्रीन टाइम मिलने के बावजूद वह फिल्म में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में कामयाब रहते हैं।
🎬 निर्देशन और तकनीकी पक्ष
अभिराज मिनावाला अपने डायरेक्शन से फिल्म की शुरुआत से लेकर अंत तक एक गंभीर और बेचैन माहौल में बनाए रखने में कामयाब होते हैं। कहानी में कई ट्विस्ट और टर्न मौजूद है जो दर्शकों के मन पर अपना असर छोड़ते हैं। हालांकि इंटरवल के बाद कुछ सीन में फिल्म थोड़ी खिंची हुई महसूस होती है जिनमें लॉजिक की कमी बिल्कुल साफ नजर आती है।
🎵 संगीत की खासियत
फिल्म में एक भी गाना नहीं है और लेकिन फिर भी फिल्म में बोरियत महसूस नहीं होती। बैकग्राउंड म्यूजिक ही इतना इंटेंस है कि हर सीन में तनाव, डर और बेचैनी का माहौल महसूस होता है।
📷 सिनेमैटोग्राफी और प्रस्तुति
तकनीकी तौर पर फिल्म मजबूत नजर आती है। सिनेमैटोग्राफी भी कहानी के मूड को बेहतरीन तरीके से सपोर्ट करती है। रंगों का बेहतरीन चुनाव, लो-लाइट फ्रेम्स और क्लोज-अप शॉट्स किरदारों की क्रूरता और सीन की संवेदनशीलता दोनों भावों को उभारते हैं। एक्शन सीक्वेंस एकदम रियल जैसे लगते हैं और कहीं भी बनावटीपन महसूस नहीं होने देते।
तकनीकी तौर पर फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक टेंशन बनाए रखता है। कैमरा वर्क दिल्ली की गलियों और इसमें पंप रहे अपराध की स्याह दुनियाँ को बिल्कुल करीब से दिखाता है। हालांकि फिल्म की एडिटिंग थोड़ी और कसी हुई हो सकती थी।
❌ कमजोर पक्ष
सेकेंड हाफ में कहानी थोड़ी खिंची हुई लगती है, कुछ दृश्यों में लॉजिक की कमी भी साफ नजर आती है। इसे देखने के लिए आप अपने सारे लॉजिक एक किनारे पर रख सकते हैं।
दूसरे विलयन और रानी की बीच मे समार्ट खेल के कारण निर्दयी अम्मा का किरदार अंडरयुज्ड रह जाता है।
शिवानी के किरदार में सिंघम टाइप हीरोइजम भी खूब भरा गया है। कहीं-कहीं उनकी ओवर द टॉप डायलॉगबाजी फिल्म की गंभीरता को कम कर देती है। लेकिन यह रानी की नहीं लेखनी की कमी है।
फिल्म से जुडी कुछ रोचक बातें
- मुख्य विषय (Plot): फिल्म बाल तस्करी, लापता लड़कियों, भीख मांगने वाले रैकेट, तथा मेडिकल रिसर्च के नाम पर होने वाले अमानवीय शोषण जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों पर आधारित है, जो इसे काफी रीयलिस्टिक और डार्क बनाता है।
- शक्तिशाली विलेन ‘अम्मा’: इस बार विलेन एक महिला (‘अम्मा’) है, जिसे बेहद क्रूर और धूर्त दिखाया गया है। जो लीड हीरो को दमदार टक्कर देता है।
- अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन: कहानी सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहती, बल्कि बाल तस्करी के तार कोलंबो (श्रीलंका) तक भी जाते हैं.
- OTT प्लेटफार्म: थिएट्रिकल रिलीज के बाद, फिल्म के नेटफ्लिक्स (Netflix) पर स्ट्रीम होने की पुष्टि की गई है.
- ग्राउंडेड स्टोरी: यह फिल्म सीआईडी या क्राइम पेट्रोल की कहानियों की तरह एकदम जमीनी हकीकत से जुड़ी हुई लगती है।
- रानी मुखर्जी: शिवानी शिवाजी रॉय के रोल में रानी की दहाड़ और उनकी एक्टिंग फिल्म की जान है, जो इस बार पहले से कहीं ज्यादा इंटेंस लग रही हैं।
- विलेन (अम्मा): ट्रेलर में मल्लिका प्रसाद (अम्मा) के किरदार को बहुत खतरनाक, सनकी और भयानक विलेन के रूप में दिखाया गया है, जो रानी को कड़ी टक्कर दे रही है।
- एक्शन और सस्पेंस: ट्रेलर में जबरदस्त एक्शन, थ्रिलर एलिमेंट्स और रोंगटे खड़े करने वाले सीन हैं, जो दर्शकों को बाँधे रखने का वादा करते हैं।
📊 हिट या फ्लॉप विश्लेषण
फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा कलेक्शन किया है। सोशल मीडिया पर दर्शकों की प्रतिक्रिया सकारात्मक है और इसे फैमिली ऑडियंस से अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है।
मर्दानी 3 एक जरूरी और झकझोर देने वाली फिल्म है, जो छोटी बच्चियों की किडनैपिंग, ट्रैफिकिंग और मेडिकल रिसर्च के नाम पर होने वाले अमानवीय शोषण को बेबाकी से सामने लाती है। गर्ल चाइल्ड ट्रैफिकिंग, बच्चों से भीख मंगवाना या ऑर्गन ट्रैफिकिंग की कहानियां पहले भी कई फिल्मों और वेब सीरीज में देखी जा चुकी हैं, इसके बावजूद यह केस एक नए मुकाम तक पहुंचता है।
आयुष गुप्ता का कसा हुआ स्क्रीनप्ले दर्शकों को बांधे रखता है। अम्मा और शिवानी के बीच एक-दूसरे की औकात दिखाते कुछ डायलॉग सिटीमार साबित होते हैं। रानी अपनी परफ़ोर्मेंस से दर्शकों को बांधे रखती है।
दमदार अभिनय, मजबूत बैकग्राउंड स्कोर और प्रभावशाली क्लाइमेक्स फिल्म को देखने लायक बनाते हैं। कमजोर संवाद और थोड़ी खिंची हुई पटकथा के बावजूद, यह फिल्म दर्शकों को सोचने और असहज होने पर मजबूर करती है।
मर्दानी 3 की सबसे बड़ी ताक़त उसका विषय और उसकी ईमानदार, बिना समझौते वाली प्रस्तुति है। फिल्म अपराध को सनसनी या मनोरंजन के रूप में नहीं दिखाती।
⭐ हमारी रेटिंग
- कहानी: ⭐⭐⭐⭐☆
- अभिनय: ⭐⭐⭐⭐☆
- निर्देशन: ⭐⭐⭐⭐☆
- मनोरंजन: ⭐⭐⭐⭐☆
कुल रेटिंग: 4/5 ⭐⭐⭐⭐☆
👍 क्या यह फिल्म देखनी चाहिए?
अगर आप इमोशनल, एक्शन और थ्रिलर फिल्मों के शौकीन हैं, तो “मर्दानी-3” आपके लिए एक अच्छा विकल्प हो सकती है। फिल्म में एक के बाद एक ट्विस्ट और टर्न भी आते रहते हैं। हालांकि, अगर आप इन्वेस्टिव थ्रिलर फिल्मों के शौकीन हैं तो कुछ प्लॉट ट्विस्ट का अंदाजा पहले भी लगा सकते हैं।
यह फिल्म फैमिली के साथ देखने लायक है और अपने संदेश के कारण दिल को छू जाती है।
शिवानी जैसे-जैसे इस केस में घुसती है, इसकी जड़ें कहीं ज्यादा गंभीर अपराध की दलदल में धंसी होती हैं? क्या शिवानी इन बच्चियों को बचा पाती है? किडनैपिंग की ये कड़ियां कहां तक जुड़ी हुई हैं? क्या वह इस अमानवीय सच तक पहुंच पाएगी और शिवानी इस पूरे नेटवर्क को कैसे तोड़ पाएगी? यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी।
कुल मिलाकर, फिल्म की एक और अहम ख़ूबी यह है कि वह अपराध के पीछे छिपी सोच पर सवाल उठाती है। हर बार लड़कियों को ही निशाना क्यों बनाया जाता है? यह सवाली पूछती रानी मुखर्जी की यह फिल्म ‘मर्दानी 3’ देखी जानी चाहिए।
❓ FAQs
Q1. क्या मर्दानी 3 फैमिली फ्रेंडली है?
हाँ, लेकिन कुछ इंटेंस क्राइम सीन छोटे बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं हो सकते।
Q2. मर्दानी 3 की रेटिंग क्या है?
हमारी तरफ से 4/5 स्टार।
Q3. क्या यह फिल्म पहले पार्ट से बेहतर है?
कहानी और एक्शन के मामले में यह पिछले पार्ट्स से अधिक गंभीर और थ्रिलिंग है।
जेंडर और वर्ग आधारित हिंसा पर मजबूत प्रहार करती फिल्म मर्दानी 3
आईपीएस शिवानी शिवाजी रॉय के किरदार के ज़रिये फिल्म संदेश देती है कि कानून का मक़सद केवल सजा देना ही नहीं होता, उसका उद्देश्य होता है हर उस जीवन की रक्षा करना, जिसे अक्सर कमजोर व पिछड़ा मानकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। कानून के लिए सभी इंसान समान है चाहे उसका परिवार, उसकी हैसियत या सामाजिक दर्जा कोई कुछ भी हो।
हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा में जब भी किसी मजबूत स्त्री की बात होती है, तो अक्सर उसे एक अपवाद बनाकर पेश किया जाता है या फिर एक ऐसे नैरेटिव में बांध दिया जाता है, जहाँ की ताक़त पितृसत्तात्मक ढांचे की स्वीकृति से मापी जाती है। महिला के इमोशन्स, उसका नैतिक द्वंद्व आदि के लिए यहाँ बहुत ही कम जगह दी जाती है।
पुलिस वर्दी में दिखाई देने वाली स्त्री अक्सर या तो एक प्रतीक भर रह जाती है या फिर एक रोमांचक फैंटेसी। लेकिन हिंदी सिनेमा में कुछ फिल्में ऐसी भी हैं जो जो महिला केंद्रित होने के साथ-साथ सत्ता, हिंसा और पितृसत्तात्मक सोच पर सीधा सवाल उठाती है और मर्दानी सीरीज उन गिनी-चुनी फिल्मों में से एक हैं।
यह सीरीज़ सिर्फ़ एक मज़बूत महिला पुलिस अफ़सर की कहानी ही नहीं कहती, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था को भी एक कठघरे में खड़ा कर देती है, जहाँ लड़कियों की सुरक्षा, उनके अरमानों और ज़िंदगी को अब भी प्राथमिकता नहीं मिलती। इसकी हर कड़ी यह संदेश देती है कि जेंडर आधारित हिंसा कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक समस्या है।
मर्दानी 3 में रानी मुखर्जी ने एक बार फिर आईपीएस शिवानी शिवाजी रॉय का किरदार निभाया है। यह किरदार सिर्फ़ अपराधियों से ही नहीं लड़ता, बल्कि उस पाश्चात्य लिंगवर्गीय, वर्गीय और पितृसत्तात्मक सोच को भी चुनौती देता है, जिसमें कुछ ज़िंदगियां ज़्यादा कीमती और कुछ कम अहम मानी जाती हैं। फिल्म कानून-व्यवस्था के सवाल से एक कदम आगे बढ़कर संवेदनशीलता, बराबरी और सभी नागरिकों की सामाजिक ज़िम्मेदारी की भी बात करती है। मर्दानी-3 दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि लड़कियों के खिलाफ़ अपराध क्या सिर्फ़ क़ानून की विफलता है? नहीं, बल्कि यह समाज की सामूहिक चुप्पी का नतीजा भी है।
बेक ग्राउन्ड म्यूजिक में महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् का इस्तेमाल फिल्म की आत्मा को और मज़बूती प्रदान करता है। यह सिर्फ़ पृष्ठभूमि संगीत नहीं रह जाता, बल्कि नारी शक्ति का प्रतीक बनकर उभरता है, एक ऐसी शक्ति, जो सहनशील है लेकिन ज़रूरत पड़ने पर किसी भी अन्याय के ख़िलाफ़ खड़ी हो जाती है।
मर्दानी 3 साफ़ तौर पर दिखाया गया है कि कैसे आज भी कई जगहों पर स्त्री के शरीर को नियंत्रण, प्रयोग और मुनाफ़े की वस्तु माना जाता है। यह फिल्म केवल इससे जुड़े अपराधियों को ही नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को भी कठघरे में खड़ा करती है जहाँ गरीब, लावारिस और हाशिये पर खड़ी बच्चियों की बार-बार अनदेखी कर दी जाती है। वर्गीय असमानता को कहानी में बहुत ही सहजता और प्रभावशाली ढंग से पिरोया गया है।
यह समाज के सामने कई असहज सवाल खड़े करती है। आखिर हर दौर में हिंसा, शोषण और अमानवीय अपराधों का सामना स्त्रियों को ही करना पड़ता है। कभी मानव तस्करी तो कभी यौन हिंसा तो कभी विज्ञान और विकास की आड़ में किए जाने वाले प्रयोगों के बहाने। सोच और तकनीक बदलने के बावजूद भी समाज में स्त्री के प्रति सोच में बदलाव बेहद धीमा रहा है।
मर्दानी-3 का सबसे अहम संदेश यही है कि स्त्रियाँ कमज़ोर नहीं हैं काजोर हैं उन्हें कमज़ोर मानने वाली मानसिकता। यह मानसिकता केवल अपराधियों में नहीं होती, बल्कि समाज का भला करने वाले समाज से ठेकेदारों की सोच भी ऐसी ही है। इस सोच की जड़े आज भी समाज और व्यवस्था में गहराई से मौजूद है।
इस फिल्म दिखाया गया है कि वर्गीय असमानता किस तरह न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित करती है। बड़े घर की बच्ची और सड़क पर रहने वाली लावारिस बच्ची, दोनों के साथ होने वाला व्यवहार समाज की प्राथमिकताओं को उजागर करता है। मर्दानी-3 इस असमानता पर सवाल उठाती है और दर्शक को सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारी संवेदनशीलता भी वर्ग या लिंग के आधार पर तय होनी चाहिए? यह फिल्म सिर्फ़ मनोरंजन ही नहीं करती बल्कि ये आपको एक आत्ममंथन के लिए मजबूर करती है। इसलिए मर्दानी 3 को केवल मनोराजन की दृष्टि सिर्फ देखा ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि इसे समझा जाना चाहिए क्योंकि इसमें ऐसे सवाल उठाए गए हैं जो आज भी हमारे समाज की काली और कड़वी सच्चाई है।
मर्दानी 3 सिर्फ़ एक फिल्म नहीं है, बल्कि एक सख़्त और ज़रूरी चेतावनी है कि अब भी हमने अपनी रूढ़िवादी सोच को नहीं बदला तो इसके परिणाम भयानक हो सकते हैं।